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अरबिंद तिवारी

भारतीय गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह, जिनकी मेधा को भारत न तो पहचान सका, न उसका आदर कर सका।
भारतीय गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह, जिनकी मेधा को भारत न तो पहचान सका, न उसका आदर कर सका।

भारत में नालंदा है, तक्षशिला भी थी, पर हार्वर्ड नहीं है। हार्वर्ड तो छोड़िए, एक कोलंबिया या फिर एक यूपेन के स्तर का विश्वविद्यालय भी नहीं है। आजादी के सत्तर सालों के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धि के नाम पर हमारे पास बस कुछ आईआईटी, एक एम्स, और एक आईएसआई हैं। दुख का विषय यह है कि इन्हें भी दुनिया के शीर्षस्थ विश्वविद्यालयों में शुमार नहीं किया जाता।

क्या वजह है कि शिक्षा और ज्ञान के मामले में कभी दुनिया का सिरमौर रहे भारत में आज एक भी विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान नहीं हैं और यहाँ नयी दवाओं, नये सिद्धांतों, नयी परिकल्पनाओं का प्रतिपादन-खोज़ लगभग नगण्य है। ऐसा नहीं है कि हमारे छात्र मेधा में कम हैं। भारतीय छात्र बुद्धिमता, परिश्रम, लगन और एकाग्रचित्तता में अन्य देशों के छात्रों की ही तरह हैं और उन्हें पूरी दुनिया में काफी ज़हीन माना जाता है।

फिर वही छात्र, वही आईआईटियन, अपने देश में फर्क क्यों नहीं पैदा कर पाते? यहाँ उनकी चमक क्यों आभाहीन रह जाती है? उनकी मेधा बस एक फ्लिपकार्ट और एक इन्फोसिस तक सिमट कर क्यों रह जाती है?

इसकी एक वजह सदियों की दासता हो सकती है। दूसरी वजह, भाषागत कमियाँ और विज्ञान की शिक्षा अपनी मातृभाषा की बजाय आंग्लभाषा में करने की मजबूरी हो सकती है। तीसरी वजह अपनी जड़ों से कट जाना और पश्चिमी सभ्यता की अधूरी नकल भी हो सकती है। पर हम इन वजहों पर कभी और चर्चा करेंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में पीछे रहने की एक चौथी वजह भी है। वह है समाज में ज्ञान की संस्कृति का अभाव। ज्ञान और शिक्षा के प्रति समादर की कमी की वजह से भी यह संकट है और आज मैं इसी की चर्चा विशेष रूप से करूँगा।

एक समय था, जब हमारे देश में ज्ञान को सबसे उच्च स्थान दिया जाता था। भले ही आप राजा हों, नीति नियमन किसी विद्वान के द्वारा ही किया जाता था। राजा विद्वानों के सामने झुकते थे। विद्वानों-शिक्षकों के पास कोई संपत्ति नहीं होती थी, उनके पास केवल चिंतन-मनन करने और उससे समाज हित को लाभान्वित करने का अधिकार था। संपत्ति व सुख-विलास तो सामान्य जनों के लिए था, शिक्षकों-विद्वानों-चिंतकों के लिए नहीं।

इन शिक्षकों-विद्वानों की आजीविका समाज की मदद से चलती थी, पूरा समाज इन्हें भिक्षा देने, उनका पोषण करने को कृतसंकल्प था। समाज गेरुआ पहनकर श्मशान में विचरण करनेवाले और दोहे पढ़नेवाले और कभी-कभी असामान्य सी गतिविधियाँ करनेवाले की भूमिका जानता था। और विद्वान भी भिक्षा माँगने, माँगकर गुजारा करने और अपने तथा शिष्यों के गुजर-बसर की व्यवस्था करने में लज्जित नहीं होते थे।

गेम थ्योरी के प्रतिपादक जॉन नैश जब मानसिक संतुलन खो बैठे और उनके ठीक होने की उम्मीद पूरी तरह से खत्म हो गयी, तब भी तीन दशकों, यानी पूरे तीस सालों तक वे प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के प्रांगण में मुक्त विचरण करते रहे। जब वे लगभग विक्षिप्त की तरह व्यवहार करते थे, जब दीवारों पर लिख देते थे, खाली ब्लैकबोर्ड को काला करते रहते और खुद को एक दूसरे ग्रह का प्राणी समझकर व्यवहार करते थे, तब भी प्रिन्सटन के प्रबंधन, छात्रों एवं मानसिक रूप से स्थिर प्राध्यापकों ने उन्हें वहाँ से हटाने की बात कल्पना में भी नहीं सोची।

पूरे तीस साल तक वह विक्षिप्त बन प्रिन्सटन के कमरे में रहकर, उसके प्रांगण में उन्मुक्त विचरण करते रहे। किसी ने उन्हें कोई बिल नहीं थमाया। सबने उन्हें एक ऐसे गणितज्ञ के रूप में देखा, जिसने मानसिक संतुलन खो दिया था। वह जब ठीक था तो प्रिन्सटन का था, जब विक्षिप्त हो गया तो भी प्रिन्सटन का ही रहा। 36 सालों तक एक भी पेपर न प्रकाशित न करने के बावजूद और गुमनामी के अंधेरे में जीते रहने के बावजूद, उसे अंततः जब नोबेल पुरस्कार दिया गया, उस दिन भी वह प्रिन्सटन का ही था।

अब जरा कल्पना कीजिए अपने आईआईटी की, अपने एम्स की, अपने किसी भी स्कूल की या कॉलेज की। क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं? हमारे पास भी थे वशिष्ठ नारायण सिंह। हमने कितनी सुधि ली उनकी?

पर हम हमेशा ऐसे नहीं थे। हमारे समाज में ज्ञानियों को स्वतंत्रता थी चिंतन-मनन करने की और अपनी बात बेलाग, बिना परिणाम की चिंता किये हुए कहने की। यह शास्त्रार्थ और वाद-विवाद की धरती रही है। यहाँ चार्वाक को ईश्वर की सत्ता पर सवाल उठाने की छूट देने की, यहाँ कबीर को संत कहने, रेदास को नमन करने की परंपरा रही है।

पर इसी धरती पर ज्ञान और शिक्षा का एकमात्र अर्थ एक अच्छी सी चाकरी हथियाने का जरिया मात्र माना जाता है। जिसने जितनी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा क्रैक की, वही ज्ञानी। फिर पहली ही पोस्टिंग से मोटी कमाई शुरू और ज्ञान से सरोकार गया रसातल में। सच तो यह है कि जेनरल नॉलेज सामान्य सूचना होती है। और तार्किक परीक्षण के उलझाने वाले सवाल आपके दिमाग के ऑब्जेक्टिव स्किल को कुछ हद तक प्रतिविंबित कर सकते हैं, पर ये आपके कुल ज्ञान के एक फीसदी को भी विंबित नहीं करते। टैगोर बैंक पीओ की परीक्षा में पूछे जानेवाले तार्किक परीक्षण के सवालों से नहीं जाँचे जाते। एक कविता की एक पंक्ति पर एक हफ्ते तक मनन करनेवाला टैगोर होता है। एक गणितीय समस्या के एक हल पर पूरी जिंदगी खपा देनेवाला रामानुजम होता है।

स्वयं से पूछिए, आपको भी अपने जीवन में एक-दो ऐसे टैगोर मिले होंगे, ऐसे रामानुजम दिखे होंगे। आपका व्यवहार कैसा था उनके प्रति? सबसे पहले तो यही पूछिए कि क्या वह टैगौर, वह रामानुजम आज भी जीवित है या नहीं? क्या आपको यह पता भी है कि वह जीवित है या नहीं? या आपने सनकी-दीवाना समझकर अपने जीवन से ही डिलीट कर दिया है? यदि आपके बाप-दादाओं ने भी कबीर को ऐसे ही डिलीट कर दिया होता तो? बुद्ध को अनदेखा कर दिया होता तो?

जॉन नैश - अमेरिकी जिनियस।
जॉन नैश – अमेरिकी जिनियस।

मेरा यह मानना है कि व्यक्तिगत क्षमता की एक सीमा होती है। आईंस्टीन खुद पैदा होते हैं, यह सच है। पर वे आईंस्टीन बन सकें, विकसित हो सकें, और खुद को अभिव्यक्त कर सकें, इसके लिए एक ज्ञान पिपासु समाज की भी जरूरत होती है।

हार्वर्ड के कुछ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल की जद में विश्व के तीन प्रसिद्ध और शीर्षस्थ विश्वविद्यालय हैं। इसलिए, क्योंकि अमेरिकी समाज ज्ञान का महत्व समझता है। वहाँ के विश्वविद्यालयों को यह पता चल जाए कि यूगाँडा के जंगलों में एक तीक्ष्ण मेधा का विद्यार्थी है, जो सेकंड में ही गणित की समस्याएँ हल कर देता है तो वे सारी बाधाओं को दूर करते हुए अपने यहाँ बुला लेते हैं, सबकुछ अनदेखा कर और उसपर भारी संसाधनों का निवेश भी करते हैं, उससे डिग्री नहीं पूछते, बल्कि उसे डिग्री देने के लिए एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते हैं । वे जानते हैं कि आज किया गया भारी निवेश कल पूरी मानवता के लिए लाभप्रद साबित हो सकता है। उस बालक की एक खोज, एक सिद्धांत, एक रचना भी कालजयी, जीवनरक्षक बन सकती है।

और हम? हमारे बुधिया आधे रास्ते सूख जाने को अभिशप्त हैं। हमारी प्रतिभाएँ जंगलों में बकरियाँ चराती रह जाती हैं, कुपोषण से अंधी हो जाती हैं, सामान्य पेचिस से मर जाती हैं, सामान्य डिहाइड्रेशन से खुद को नहीं बचा पातीं।

अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। आप जीवन में इतने सफल रहे, आपने इतना नाम-पैसा अर्जित किया। जो भी किया हो, वह करोड़ों दूसरों से बेहतर किया है। और यह सब अपनी शिक्षा के बल पर किया। वही शिक्षा जिसे आपके टूटी-फूटी दीवारों और रिसते छप्पर-छत वाले स्कूल ने और गलत-सलत अंग्रेजी बोलनेवाले शिक्षकों ने दी थी। आपने मुड़कर उस स्कूल, उन शिक्षकों, उस स्कूल में आज भी वैसी ही स्थिति में पढ़ रहे बच्चों के लिए क्या किया? रतन टाटा, मुकेश अंबानी, नंदन नीलकेणी जैसे सैकड़ों सफल भारतीयों ने अपने आल्मा मेटर अमेरिकी विश्वविद्यालयों को अरबों डॉलर का डोनेशन दिया है। इसलिए क्योंकि वे ज्ञान और ज्ञान की संस्कृति को अक्षुण्ण रखने की अहमियत जानते हैं।

आपके पास डॉलर नहीं हैं, करोड़ों नहीं हैं। बस कुछ सौ होंगे। तो कितने सौ आपने उन बच्चों के लिए दिये जिन्होंने आज तक स्लेट छुआ नहीं, कितने सौ अपने घर के बगल के छतविहीन स्कूल को दिये, जिसकी छत टपकने पर बच्चे बरसात खत्म होने का इंतजार करते हैं? नहीं दिये? तो आपके घर के बगल में हार्वर्ड हो, इसकी उम्मीद क्यों लगाये बैठे हैं आप?

याद रखें ज्ञानी उसी समाज को मिलते हैं, वहीं पनपते हैं, जहाँ ज्ञान की इज्जत करनेवाले लोग होते हैं। हम नहीं हैं। इसलिए हमें ज्ञानी अब नहीं मिलते। कबीर और बुद्ध नहीं मिलते।

An English translation of the same article is also available here:

 
 
 
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